Supreme Court criticism not contempt: सुप्रीम कोर्ट ने अदालत के फैसलों की आलोचना को लेकर अहम टिप्पणी की। Supreme Court ने स्पष्ट किया कि किसी भी जजमेंट की तीखी आलोचना को न्यायपालिका की अवमानना नहीं माना जा सकता (Supreme Court criticism not contempt)। कोर्ट ने कहा कि लोगों को फैसलों पर अपनी राय रखने और असहमति जताने का पूरा अधिकार है (Court judgment criticism rights India)।
यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें याचिकाकर्ता पंकज पुष्कर (Pankaj Pushkar) ने बताया कि पहले कोर्ट ने स्कूली किताबों से ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ वाले विवादित अंश को हटाने का निर्देश दिया था, लेकिन अन्य किताबों में अब भी ऐसे हिस्से मौजूद हैं जो न्यायपालिका को नकारात्मक रूप में दिखाते हैं।
NCERT किताब का उदाहरण
सुनवाई के दौरान NCERT की एक किताब का हवाला दिया गया (NCERT books judiciary chapter review panel), जिसमें लिखा है कि कुछ लोग मानते हैं कि हाल के कुछ फैसले आम लोगों के हित में नहीं हैं, खासकर झुग्गीवासियों की बेदखली से जुड़े मामलों में (Slum eviction court remarks)। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह केवल एक दृष्टिकोण है और इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी फैसले को गलत बताना या उससे असहमति जताना पूरी तरह स्वीकार्य है।
केंद्र सरकार ने बनाई समीक्षा समिति
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Tushar Mehta statement court) ने बताया कि केंद्र सरकार ने स्कूल की किताबों में न्यायपालिका से जुड़े अध्यायों की समीक्षा के लिए एक पैनल गठित किया है। इसमें पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज Indu Malhotra और पूर्व अटॉर्नी जनरल K. K. Venugopal शामिल हैं (K K Venugopal committee) ।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि किसी भी फैसले को अलग-अलग नजरिए से देखा जा सकता है (criticism of judgments allowed)। कोई एक पक्ष किसी को अतिक्रमणकारी मान सकता है, जबकि दूसरा पक्ष उन्हें लंबे समय से वहां रह रहे नागरिकों के रूप में देख सकता है। अदालत ने अंत में कहा कि फैसलों की आलोचना न्यायपालिका की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाती (Judiciary dignity controversy)।



