रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने की कोशिशों को एक बार फिर झटका लगा। स्विट्जरलैंड के जेनेवा में रूस और यूक्रेन के बीच चल रही शांति वार्ता अचानक खत्म हो गई। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने इस वार्ता को बेहद कठिन बताया। उन्होंने कहा कि, रूस के साथ इस वार्ता के लिए जरिए किसी निष्कर्ष तक पहुंचना आसान नहीं था। लेकिन, इस मामले में उस वक्त एक नया मोड़ आया जब जेलेंस्की ने पुतिन के साथ-साथ अमेरिकी राष्ट्रपति को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। एक अमेरिकी वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में जेलेंस्की ने कहा कि,“डोनाल्ड ट्रंप सार्वजनिक रूप से सिर्फ यूक्रेन को रियायतें देने को कह रहे हैं, रूस से इस मामले पर कुछ नहीं बोल रहे।” जेलेंस्की ने ये भी कहा कि, शांति समझौते के तहत अगर यूक्रेन से पूर्वी डोनबास के उन इलाकों को छोड़ने को कहा गया जिनपर रूस ने अभी तक कब्जा नहीं किया है, तो यूक्रेनी जनता जनमत संग्रह में उसे खारिज कर देगी। जेलेंस्की ने इशारों-इशारों में कहा कि, उन्हें पूरी उम्मीद है कि ये सिर्फ ट्रंप की रणनीति हो सकती है, आखिरी फैसला नहीं।

जेलेंस्की ने ट्रंप की नीयत पर क्यों उठाए सवाल?
जेलेंस्की का बयान आते ही रूसी समाचार एजेंसी ने औपचारिक रूप से इस बात का ऐलान कर दिया कि दोनों देशों के बीच चल रही वार्ता समाप्त हो गई है। हालांकि, रूस के मुख्य वार्ताकार व्लादिमीर मेडिंस्की ने कहा कि, अगली वार्ता बहुत जल्द शुरु होगी। वैसे तो उन्होंने कोई तारीख नहीं बताई, लेकिन यूक्रेन के वार्ताकार ने इस बात की पुष्टि जरूर की, कि दोनों देशों के बीच बातचीत करीब 2 घंटे तक चली। गौरतलब है कि जेनेवा में हुई रूस-यूक्रेन की वार्ता अबू धाबी में दो दौर की वार्ता के बाद हुई थी। तीनों वार्ताओं में अमेरिका मध्यस्थ की भूमिका में था। यही वजह है जेलेंस्की ने पुतिन के साथ-साथ ट्रंप को कटघरे में खड़ा किया। रूस ने यूक्रेन के 20 फीसदी क्षेत्र पर कब्जा जमाया हुआ है। इसमें क्रीमिया और पूर्वी डोनबास का इलाका भी शामिल है। रूस ये चाहता है कि, यूक्रेन इन इलाकों पर अपनी दावेदारी ना करे। जबकि यूक्रेन इसे लेकर राजी नहीं है। दूसरी तरफ अमेरिका चाहता है कि चार सालों से चल रहा ये युद्ध खत्म हो जाए। यही वजह है कि, ट्रंप बार-बार संकेत दे रहे हैं कि यूक्रेन अपनी जिद छोड़ दे। हाल के दिनों में ट्रंप ने धमकी भी दी थी कि, इस युद्ध को जारी रखने के लिए अमेरिका अपने पैसे और संसाधन खर्च करने की स्थिती में नहीं है। जिसके बाद जेलेंस्की ने यूरोपीयन यूनियन में शामिल देशों का रूख किया था। फ्रांस, इंग्लैंड और इटली ने जेलेंस्की को अपना पूरा समर्थन भी दिया था। जिसके बाद से ट्रंप जेलेंस्की से उखड़े-उखड़े नजर आ रहे हैं।




