13 साल तक कोमा में रहने के बाद आखिरकर हरीश राणा को मुक्ति मिल गई। सुप्रीम कोर्ट के मिली निष्क्रिया इच्छा मृत्यु की इजाजत के बाद हरीश राणा ने एम्स में आखिरी सांस ली। हरीश राणा 14 मार्च से एम्स में भर्ती थे। देश में इच्छामृत्यु देने का ये पहला मामला है।

बेटे के लिए हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थी मां
एम्स में डॉक्टरों की एक कमेटी गठित हुई थी, जो हरीश राणा की पल-पल की निगरानी कर रही थी। टीम ने धीरे-धीरे हरीश राणा की ट्यूब हटा दी थी, जिससे उन्हें खाना पानी दिया जा रहा था। निधन से पहले 23 मार्च को डॉक्टरों ने कहा था कि फिलहाल उन्हें कुछ दिन और अस्पताल में निगरानी में रखा जा सकता है। वह पिछले एक सप्ताह से बिना खाना और पानी के जीवित हैं। 6 दिनों से चल रही इस प्रक्रिया के दौरान हरीश के माता-पिता अभी भी किसी चमत्कार का इंतजार कर रहे थे। उनकी मां अस्पताल के गलियारे में बैठकर हाथ में हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थीं। मगर आज वो बेटा उन्हें छोड़कर हमेशा के लिए इस दुनिया से चला गया।
हरीश राणा के साथ क्या हुआ था?
हरीश राणा 13 साल से मेडिकल सपोर्ट सिस्टम पर थे। जब वो पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र थे, उस दौरान साल 2013 में वो अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। हरीश राणा के सिर में गंभीर चोटें आई थी, जिस कारण उन्हें 100% क्वाडीप्लेजिक डिसेबिलिटी हो गई। हरीश के माता-पिता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को हरीश को निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की इजाजत दी थी। कोर्ट ने कहा था कि 13 साल में हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं आया, कृत्रिम तरीके मरीज को जिंदा रखना तब तक ही उचित है, जबतक इलाज से कुछ लाभ हो रहा हो, उसके ठीक होने की कोई संभावना हो। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हरीश राणा को इच्छा मृत्यु देने के लिए एम्स लाया गया था।



