नई दिल्ली/हेग: भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने जल विवाद में एक बार फिर भारी तनाव पैदा हो गया है। हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता अदालत (Permanent Court of Arbitration – PCA) ने 31 अगस्त 2026 को 1960 की सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर पाकिस्तान के पक्ष में एक फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि यह संधि पूरी तरह से लागू रहेगी और भारत इसे एकतरफा निलंबित या स्थगित (‘इन अबेयंस’) नहीं रख सकता। हालांकि, भारत ने इस तथाकथित अदालती फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और इसे महज ‘कागज का टुकड़ा’ करार दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने साफ कर दिया है कि वह इस ‘अवैध रूप से गठित’ अदालत के अधिकार क्षेत्र को मान्यता नहीं देता और नई दिल्ली का पुराना रुख बिल्कुल कायम है—”खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।”
पहलगाम हमला और भारत का कड़ा फैसला
भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर 1960 में सिंधु जल संधि हुई थी। लेकिन अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ, जिसमें 26 नागरिकों की मौत हो गई थी। जांच में हमलावरों के तार पाकिस्तान से जुड़े पाए गए। इस कायराना हमले के ठीक एक दिन बाद, भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ दंडात्मक कदम उठाते हुए सिंधु जल संधि को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित (In Abeyance) कर दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट संदेश दिया कि जब तक पाकिस्तान अपनी सरजमीं से सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और अपरिवर्तनीय रूप से बंद नहीं करता, तब तक संधि की प्रक्रियाएं निलंबित रहेंगी।
हेग कोर्ट का फैसला क्या है?
भारत के इस सख्त कदम से घबराकर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय अदालत पहुंचा था। पांच सदस्यीय मध्यस्थता अदालत ने अपने सर्वसम्मत फैसले में कहा, “सिंधु जल संधि में किसी भी एक पक्ष द्वारा इसे एकतरफा निलंबित करने या स्थगित रखने का कोई प्रावधान नहीं है। भारत को इस संधि के तहत अपने दायित्वों का पालन करना होगा।” अदालत ने जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बन रहे भारत के रतले जलविद्युत परियोजना (Ratle Hydroelectric Plant) के बांध की दीवार और पावर इनटेक स्ट्रक्चर के निर्माण पर अस्थायी सीमाएं तय करने का आदेश दिया है। यह रोक विश्व बैंक द्वारा नियुक्त ‘तटस्थ विशेषज्ञ’ (Neutral Expert) के अंतिम फैसले (जो जुलाई 2027 तक अपेक्षित है) के 90 दिनों बाद तक लागू रहेगी।
भारत की दो टूक, क्यों खारिज किया फैसला?
फैसले के तुरंत बाद भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक कड़ा बयान जारी किया। भारत ने इस फैसले को मानने से साफ इनकार करते हुए निम्नलिखित दलीलें दीं
अवैध गठन: भारत का कहना है कि विश्व बैंक द्वारा पाकिस्तान के कहने पर इस मध्यस्थता अदालत का गठन खुद सिंधु जल संधि के नियमों का घोर उल्लंघन करके किया गया था।
कोई अधिकार क्षेत्र नहीं: यह कोर्ट भारत के संप्रभु फैसलों और परियोजनाओं पर टिप्पणी करने का कोई कानूनी अधिकार (Jurisdiction) नहीं रखता।
अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार: भारत ने इस मामले में शुरू से ही कोर्ट की किसी भी सुनवाई में हिस्सा नहीं लिया था, इसलिए इस फैसले का भारत के लिए कोई कानूनी वजूद नहीं है।
भारत का अगला एक्शन, अब क्या करेगी सरकार?
पाकिस्तान भले ही इस फैसले को अपनी बड़ी कानूनी जीत बताकर अंतरराष्ट्रीय मंचों (जैसे SCO समिट) पर रोना रो रहा हो, लेकिन जमीन पर भारत का अगला कदम बेहद आक्रामक रहने वाला है।
संधि को निलंबित रखना जारी रहेगा: विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद पर ठोस और सत्यापन योग्य कार्रवाई नहीं करता, तब तक सिंधु संधि पर रोक जारी रहेगी। पानी को एक रणनीतिक हथियार और दबाव के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहेगा।
परियोजनाओं का निर्माण नहीं रुकेगा: भारत ने साफ किया है कि हेग कोर्ट की टिप्पणियों का जम्मू-कश्मीर में चल रहे उसके हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स (जैसे रतले और किशनगंगा) पर कोई असर नहीं पड़ेगा और भारत अपनी संप्रभुता के तहत निर्माण कार्य जारी रखेगा।
सिर्फ ‘तटस्थ विशेषज्ञ’ से बातचीत: भारत समानांतर अदालती कार्यवाही के खिलाफ है। तकनीकी विवादों के समाधान के लिए भारत केवल विश्व बैंक द्वारा नियुक्त तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) की प्रक्रिया को ही वैध मानता है और उसी मंच पर अपनी बात रखेगा, न कि इस मध्यस्थता अदालत में।
स्थानीय जल उपयोग को बढ़ावा: भारत अब पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) के पानी का अधिकतम उपयोग भारतीय क्षेत्र, विशेषकर जम्मू-कश्मीर के किसानों और सिंचाई परियोजनाओं के लिए करने की रणनीति पर काम कर रहा है ताकि पाकिस्तान जाने वाले पानी की मात्रा को नियंत्रित किया जा सके।
प्रश्न 1: सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर हेग कोर्ट का हालिया फैसला क्या है?
उत्तर: 31 अगस्त 2026 को हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता अदालत (PCA) ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया कि 1960 की सिंधु जल संधि पूरी तरह लागू रहेगी और भारत इसे एकतरफा स्थगित नहीं रख सकता. अदालत ने जम्मू-कश्मीर की रतले परियोजना पर कुछ अंतरिम प्रतिबंध भी लगाए हैं.
प्रश्न 2: भारत सरकार ने हेग की अदालत के इस फैसले को क्यों खारिज कर दिया? [1, 2]
उत्तर: भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, पाकिस्तान के कहने पर गठित यह मध्यस्थता अदालत खुद सिंधु संधि के नियमों का उल्लंघन है. भारत इस ‘इल्लीगल’ अदालत के अधिकार क्षेत्र को मान्यता नहीं देता, इसलिए इसके किसी भी फैसले का भारत की संप्रभु परियोजनाओं पर कोई कानूनी असर नहीं पड़ेगा.
प्रश्न 3: भारत ने किस आधार पर सिंधु जल संधि को स्थगित (In Abeyance) किया था?
उत्तर: अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ था, जिसके तार पाकिस्तान से जुड़े थे। इसके बाद भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए “खून और पानी साथ नहीं बहेगा” की नीति के तहत संधि को निलंबित कर दिया था
प्रश्न 4: हेग कोर्ट के फैसले के बाद रतले और किशनगंगा जैसी भारतीय परियोजनाओं का क्या होगा?
उत्तर: भारत इन जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण कार्य अपनी संप्रभुता के तहत जारी रखेगा। भारत इस तकनीकी विवाद के समाधान के लिए केवल विश्व बैंक द्वारा नियुक्त तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) की प्रक्रिया को मानता है, जिसका अंतिम फैसला जुलाई 2027 तक आना है



