BIHAR: चाचा पशुपति पारस को भतीजे चिराग पासवान ने ऐसा धोबी पछाड़ दिया कि वो चारों खाने चित हो गए। RLJP यानि राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पशुपति पारस को ना सिर्फ NDA गठबंधन से अलग होने का फैसला करना पड़ा, बल्कि केंद्रीय मंत्री पद से भी इस्तीफा देना पड़ गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पशुपति पारस ने कहा कि, ''कैबिनेट मंत्री पद से मैं त्यागपत्र देता हूं। मेरे साथ नाइंसाफी हुई है।'' ये दो लाइनें कहकर वो खड़े हुए और चल दिए। पत्रकारों ने उनसे पूछा भी कि, आगे क्या करेंगे, कैसे करेंगे, इसके बारे में भी तो प्रकाश फेंकिए। लेकिन, पशुपति पारस ने कहा कि, जो कहना था कह दिया। अब आगे की राजनीति हम अपनी पार्टी के सीनियर पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठकर उनसे बातचीत के बाद तय करेंगे। वैसे, एक बड़ी पुरानी कहावत है खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। पशुपति पारस एनडीए से नाराज़ हैं और अब आगे की रणनीति तय करने की बात कर रहे हैं। हालांकि, वो सीटों के ऐलान से पहले भी ऐसा कर चुके थे। लेकिन, इससे बीजेपी या कहें एनडीए को कोई फर्क नहीं पड़ा, और उन्होंने पशुपति को एक तरह से राजनीतिक वनवास के रास्ते पर धकेल दिया।

पशुपति पारस का बीजेपी ने क्यों किया पत्ता साफ?
पशुपति पारस ने एनडीए का दामन छोड़ दिया। वो अब अपने बलबूते चुनावी अखाड़े में उतरेंगे। वो रामविलास पासवान की परंपरागत सीट रही हाजीपुर से ताल ठोकेंगे। लेकिन, इस बार उन्हें अपना पूरा दमखम लगाना होगा। इसलिए क्योंकि बीजेपी ने उनके भतीजे यानि चिराग पासवान पर भरोसा जताया है। अब सवाल ये है कि बीजेपी ने चिराग को क्यों चुना और पशुपति से किनारा क्यों किया?
1 - बिहार में चिराग का बढ़ता जनाधार अपने पिता की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी से हाथ धोने के बाद चिराग पासवान असहज हो गए थे। लेकिन, उन्होंने खुद को संभाला और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) बनाई। इसके बाद उन्होंने आशीर्वाद यात्रा निकाली और बिहार के गांव-गांव घूमे। चिराग में पासवान समाज के साथ बाकी पिछड़ी जातियों को रामविलास पासवान का अक्स नज़र आया और वो उनकी पार्टी से जुड़ते गए। चिराग की रैलियों में लाखों की भीड़ जुटने लगी, और अब आलम ये है कि चिराग बिहार के किसी भी जिले में जाते हैं तो वहां लोगों का सैलाब उमड़ पड़ता है। यही नहीं, बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट संकल्प यात्रा जैसे आयोजनों के ज़रिए वो लोगों से जुड़ने की कोशिश करते रहते हैं। लिहाजा, बीजेपी ने पशुपति की जगह चिराग को तव्वजो दी और उन्हें लोकसभा की 5 सीटें देने का फैसला किया। 2 - पशुपति पारस की घटती लोकप्रियता पशुपति पारस ने चिराग पासवान को आउट कर अपने भाई की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी को तो हथिया लिया। लेकिन, उनसे पासवान समाज अंदर-अंदर नाराज हो गया। पासवान समाज को लगने लगा कि उन्होंने चिराग का हक मारा है। ऊपर से चिराग ने राजनीतिक विश्लेषकों को गलत साबित करते हुए जमीन पर बहुत मेहनत की और अपनी स्वीकार्यता को दोगुना किया। उन्होंने लोगों को भरोसा दिया कि वही उनकी दशा सुधार सकते हैं। उन्होंने खुद को रामविलास पासवान के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर साबित किया। यही नहीं चिराग पासवान ने अपने पिता कि विरासत के लिए हाजीपुर में भी जमकर कैंपिंग की। हाजीपुर की जनता से अपना रिश्ता जोड़ लिया। चिराग अपना दफ्तर दिल्ली से नहीं बल्कि पटना से चलाने लगे। जबकि, दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री बनते ही पशुपति पारस समाज से कट गए। दिल्ली से पार्टी चलने लगी और पटना ऑफिस की टेबलों पर धूल जमने लगी। इसका असर पशुपति की लोकप्रियता पर पड़ा, जिसे देखते हुए बीजेपी ने उनसे दूर रहने का फैसला किया।

3 - चिराग पासवान की राजनीतिक परिपक्वता सीट बंटवारे के ऐलान से पहले ही चिराग पासवान ने बीजेपी से अपनी सेटिंग फिक्स कर ली थी। जबकि, इस मामले में उनके चाचा पशुपति पारस पिछड़ गए। चिराग ने राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए बीजेपी को साधे रखा। भले ही बीजेपी ने पहले उनके चाचा को प्राथमिकता दी हो, लेकिन चिराग ने खुद को मोदी का हनुमान और एनडीए का सहयोगी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भले ही वो नीतीश कुमार को टारगेट करते रहे हों, लेकिन बीजेपी के खिलाफ कभी एक शब्द भी नहीं बोला। वहीं दूसरी तरफ पशुपति पारस को लगा कि सबकुछ उनके मुफीद चल रहा है। वो भांप ही नहीं पाए कि धीरे-धीरे बीजेपी का उनसे मोहभंग हो रहा है। ऊपर से सीट बंटवारे से पहले पशुपति पारस ने जिस तरह बीजेपी को धमकी दी, उसने ताबूत में आखिरी कील का काम किया। बीजेपी ने फैसला कर लिया कि उसे क्या करना है। तो शायद यही वजह भी है कि जहां पहले पशुपति की पार्टी को एक सीट देने की बात चल रही थी, वहां अब एक भी सीट नहीं दी गई। 4 - बीजेपी का 'युवा फर्स्ट' वाला प्लान बीजेपी हमेशा भविष्य की सोचती है। आज से 15-20 साल आगे की सोचती है। बीजेपी बिहार की राजनीति में आते उतार-चढ़ाव को देख रही है। नीतीश की बढ़ती उम्र और घटती लोकप्रियता को देख रही है। तेजस्वी यादव का बढ़ता जनाधार देख रही है। बीजेपी बिहार में अपने पार्टी नेतृत्व की कमज़ोर स्थिति भी देख रही है। तो बीजेपी ये भी देख रही है तेजस्वी के मुकाबले चिराग पासवान को खड़ा कर एक बहुत बड़ा जनमत हासिल किया जा सकता है। चिराग पासवान अभी 41 वर्ष के हैं, और उनका राजनीतिक करियर लंबा है। जबकि पशुपति पारस 72 साल के हो चुके हैं। यही नहीं वो बिहार की राजनीति में कोई खास हैसियत भी नहीं रखते। उनका पासवान वोट बैंक भी उनसे दूर हो गया है, और वो खुद बीजेपी की बैसाखी से अपनी नैया पार लगा रहे हैं। ऐसे में बीजेपी ने चिराग को चुना और उन्हें केंद्र ही नहीं बल्कि बिहार की राजनीति में अपना अहम मुहरा बना लिया। अहम मुहरा इसलिए क्योंकि चिराग के ज़रिए बीजेपी बिहार के पासवान समाज, दलित और अति पिछड़ी जातियों को ये संदेश देने में कामयाब हो सकती है कि उनका हित सिर्फ वही सोचती है, बाकी पार्टियां नहीं।




