अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर के कुछ ही घंटों बाद फिर से तनाव बढ़ता नजर आ रहा है (Iran America Conflict), जो कि ये संकेत देता है कि समझौता बेहद नाज़ुक स्थिति में है। दोनों पक्षों के बयानों से भरोसे की भारी कमी और रणनीतिक मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। ईरान ने अमेरिका पर सीजफायर के उल्लंघन का आरोप लगाया (Ceasefire Violation Iran), तो अमेरिका ने भी इसका जवाब दिया है।
ईरान की ओर से संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ (Mohammad Bagher Ghalibaf Statement) ने अमेरिका पर सीजफायर उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए। गालिबाफ ने कहा, संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रति हमारा गहरा ऐतिहासिक अविश्वास उसके द्वारा सभी प्रकार की प्रतिबद्धताओं के बार-बार उल्लंघन से उपजा है। ऐसा सिलसिला जो दुर्भाग्यवश एक बार फिर दोहराया गया है। गालिबाफ ने कहा, जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा है, ईरान के इस्लामी गणराज्य का 10 सूत्री प्रस्ताव “वार्ता के लिए एक व्यावहारिक आधार” और इन वार्ताओं का मुख्य ढांचा है। मगर इस प्रस्ताव के 3 प्रमुख प्रस्ताव का अब तक उल्लंघन किया जा चुका है (Iran Drone Violation)। गालिबाफ ने ने खास तौर पर तीन मुद्दे उठाए (Lebanon Ceasefire Issue)
- लेबनान में युद्धविराम लागू न होना
- ईरानी हवाई क्षेत्र में ड्रोन की घुसपैठ
- यूरेनियम संवर्धन के अधिकार से इनकार
गालिबाफ का बयान इस बात को दिखाता है कि ईरान इस समझौते को तभी स्वीकार्य मानता है जब उसके सभी बिंदुओं का सख्ती से पालन हो। दूसरी तरफ अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वैंस (JD Vance on Iran) ने ईरान के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि लेबनान का मुद्दा इस सीजफायर का हिस्सा ही नहीं था। उनका कहना है कि अगर ईरान इस आधार पर बातचीत से पीछे हटता है, तो यह उसका अपना फैसला होगा, मगर ये मूर्खतापूर्ण होगा ।

White House की ओर से जारी बयान और भी आक्रामक नजर आया (White House Iran Statement), जिसमें दावा किया गया कि अमेरिका ने अपने सभी सैन्य लक्ष्यों को हासिल कर लिया है और ईरान की सैन्य व रणनीतिक क्षमताओं को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया गया है।
इन बातों और बयानों से क्या संकेत मिलते है?
- भरोसे की कमी: दोनों देशों के बयान दिखाते हैं कि आपसी अविश्वास अभी भी गहरा है।
- शर्तों पर विवाद: सीजफायर के दायरे और शर्तों को लेकर स्पष्ट सहमति नहीं है।
- भविष्य अनिश्चित: ऐसे हालात में यह सीजफायर लंबे समय तक टिकेगा, इसकी संभावना कम दिखती है।
कुल मिलाकर, यह “सीजफायर” फिलहाल सिर्फ एक अस्थायी विराम जैसा नजर आ रहा है (Middle East Conflict), जहां जमीनी हालात से ज्यादा बयानबाजी हावी है। अगर दोनों पक्ष जल्द स्पष्ट शर्तों और भरोसे का ढांचा नहीं बनाते, तो टकराव फिर बढ़ सकता है।



