नई दिल्ली: संसद परिसर में उस समय दिलचस्प राजनीतिक नज़ारा देखने को मिला जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी अपने ही दल छोड़कर जाने वाले नेताओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे (TMC MP Kalyan Banerjee protest)। विरोध के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में एक टिप्पणी की, जिसके बाद दोनों नेताओं के बीच 1997 में ममता बनर्जी के कांग्रेस छोड़ने से लेकर बंगाल की राजनीति तक पर चर्चा शुरू हो गई। बातचीत के दौरान कांग्रेस सांसद पप्पू यादव और इमरान मसूद भी मौजूद रहे।
बैनर पहनकर विरोध में उतरे कल्याण बनर्जी
दरअसल लोकसभा सांसद कल्याण बनर्जी संसद के मकर द्वार पर अपने शरीर पर “20 गद्दार” लिखा बैनर टांगकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उनका विरोध उन नेताओं के खिलाफ था जिन्होंने हाल के विधानसभा चुनावों के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) का साथ छोड़ दिया। इस दौरान उनके साथ टीएमसी का कोई अन्य सांसद मौजूद नहीं था। न महुआ मोइत्रा और न ही पार्टी का कोई दूसरा नेता। कल्याण बनर्जी अकेले ही बागी सांसदों की सदस्यता समाप्त करने की मांग कर रहे थे।
प्रियंका गांधी की टिप्पणी से शुरू हुई बहस
विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रियंका गांधी वाड्रा वहां पहुंचीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि जिन नेताओं के खिलाफ कल्याण बनर्जी विरोध कर रहे हैं, उनमें से कई पहले कांग्रेस से टीएमसी में गए थे (Priyanka Gandhi taunt)। इस टिप्पणी के बाद दोनों नेताओं के बीच बातचीत शुरू हो गई। जो कि धीरे-धीरे नोकझोंक में बदल गई (Priyanka Gandhi vs Kalyan Banerjee)। कल्याण बनर्जी ने जवाब देते हुए कहा कि वे नेता टीएमसी के टिकट पर जीतकर संसद पहुंचे थे, ना कि कांग्रेस के टिकट पर सांसद नहीं बने थे। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस लंबे समय से कमजोर रही है। कल्याण बनर्जी ने कहा कि (Congress TMC controversy),
“आपलोग के उधर से 2014 में चले गए। पश्चिम बंगाल में आपलोग का कुछ भी नहीं है, नहीं था, इसलिए। कुछ नहीं कर सके। वो लोग तो हमारे टिकट से जीते है। वो लोग कभी आपके टिकट से पार्लियामेंट में नहीं आए”
पप्पू यादव भी बहस के दौरान कूदे
बातचीत के दौरान सांसद पप्पू यादव ने बीच में कहा कि वे नेता मूल रूप से कांग्रेस से ही जुड़े थे। इस पर कल्याण बनर्जी ने जवाब दिया कि वे स्वयं भी कभी कांग्रेस में थे और यूथ कांग्रेस के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेतृत्व ने ही 1997 में ममता बनर्जी को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर किया (1997 Congress split)। कल्याण बनर्जी ने कहा कि,
“अरे, कांग्रेसी तो हमलोग भी थे। कांग्रेसी तो हम भी थे। मैं तो यूथ कांग्रेस का वाइस प्रेसिडेंट था। अरे, आपलोग तो दीदी को भगा दिया था। ये बात बोलो। अगर दीदी को नहीं भगाता तो तुमलोग का ऐसा हाल होता? दीदी को 1997 में भगा दिया था।”
राजीव गांधी का भी आया जिक्र
बहस के दौरान प्रियंका गांधी ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ममता बनर्जी का सम्मान करते थे। इस पर कल्याण बनर्जी ने सहमति जताते हुए कहा कि वे भी राजीव गांधी का सम्मान करते हैं, लेकिन 1997 में कांग्रेस नेतृत्व द्वारा ममता बनर्जी के साथ किए गए व्यवहार ने हालात बदल दिए।
1997 की राजनीति फिर बनी बहस का केंद्र
कल्याण बनर्जी ने बातचीत के दौरान आरोप लगाया कि उस समय कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में सीपीएम के खिलाफ संघर्ष में ममता बनर्जी का साथ नहीं दिया। उनका कहना था कि इसी वजह से ममता बनर्जी को कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बनाने का फैसला करना पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस और सीपीएम के बीच उस समय राजनीतिक समीकरण बनने से ममता बनर्जी अलग-थलग पड़ गई थीं।
कैसे बनी थी तृणमूल कांग्रेस?
ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस से अलग होने का फैसला किया था। इसके बाद 1 जनवरी 1998 को उन्होंने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) की स्थापना की। पार्टी का चुनाव चिह्न “जुड़ा फूल” (दो फूल और घास) बना, जो बाद में पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे प्रभावशाली प्रतीक बन गया। टीएमसी ने धीरे-धीरे कांग्रेस की जगह विपक्ष के रूप में अपनी पहचान बनाई और 2011 में 34 वर्षों से सत्ता में रही वाम मोर्चा सरकार को हराकर पहली बार पश्चिम बंगाल की सत्ता पर कब्जा किया।
INDI गठबंधन बना, मगर दूरी बरकरार?
हाल के दिनों में विपक्षी गठबंधन की बैठकों में ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के बीच गर्मजोशी देखने को मिली थी। दोनों नेताओं की बातचीत और मुलाकात के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी हुई कि कांग्रेस और टीएमसी के रिश्तों में नई शुरुआत हो सकती है। कयास लगाए जाने लगे कि ममता बनर्जी कांग्रेस में कमबैक कर सकती हैं। ममता बनर्जी अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर सकती हैं। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। दीदी ने बंगाल में ही रहकर अपनी खोई जमीन तलाशने का फैसला किया है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में दोनों दल अब भी अलग-अलग रणनीति अपनाते हैं। राज्य में टीएमसी और कांग्रेस कई मौकों पर एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे हैं।
क्या पुराने विवाद आज भी असर डालते हैं?
संसद में हुई यह बातचीत भले ही हल्के माहौल में हुई, लेकिन इसने यह जरूर दिखाया कि 1997 में कांग्रेस और ममता बनर्जी के बीच हुआ राजनीतिक अलगाव आज भी टीएमसी नेताओं की राजनीतिक स्मृति का हिस्सा है।
अब सबसे बड़ा सवाल
-क्या कांग्रेस और टीएमसी अतीत की कड़वाहट नहीं भुला पाए हैं?
-क्या पश्चिम बंगाल की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा विपक्षी एकता को प्रभावित करती रहेगी?
-और क्या INDIA गठबंधन के भीतर सहयोगियों के बीच की दूरी कभी खत्म हो पाएगी?
संसद परिसर में हुई यह छोटी-सी नोकझोंक केवल दो नेताओं की बातचीत नहीं थी, बल्कि उसने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के तीन दशक पुराने राजनीतिक रिश्तों और आज के विपक्षी समीकरणों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया।



