आरक्षण और क्रीमी लेयर के मुद्दे पर देश की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से जारी गरमा-गर्मी के बीच लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बदले हुए बयानों ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जहां चिराग पासवान ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया था, वहीं अब उनके सुर बदले-बदले नजर आ रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस यू-टर्न के पीछे गठबंधन (NDA) का अंदरूनी दबाव और ‘ऊपर’ से मिले निर्देश हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे मामले पर हमेशा मुखर रहने वाले जीतराम मांझी भी अब पूरी तरह चुप हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चिराग का पहला रुख क्या था?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने और उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) की अनुमति देने वाले फैसले के बाद चिराग पासवान ने कड़ा विरोध दर्ज कराया था।
- उन्होंने साफ कहा था कि आरक्षण का आधार केवल सामाजिक है, आर्थिक नहीं।
- चिराग ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दायर करने की बात भी कही थी।
- भारत बंद के दौरान भी उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया था।
अब बयानों में क्यों आया यू-टर्न?
पिछले कुछ दिनों में चिराग पासवान के बयानों में एक स्पष्ट नरमी देखी गई है। अब वे अदालत के फैसले के कानूनी पहलुओं और सर्वदलीय सहमति की बात कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस बदलाव के तीन मुख्य कारण हो सकते हैं:
- गठबंधन धर्म और ‘ऊपर’ का संदेश: भाजपा (BJP) इस संवेदनशील मुद्दे पर देशव्यापी स्तर पर किसी बड़े विवाद से बचना चाहती है। माना जा रहा है कि शीर्ष नेतृत्व (PMO या गृह मंत्रालय) की तरफ से सहयोगियों को यह संदेश दिया गया है कि सरकार के भीतर रहकर इस तरह के मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाने से विपक्ष को मौका मिलता है।
- कैबिनेट का सामूहिक फैसला: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि सरकार बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान के मूल ढांचे के साथ खड़ी है और क्रीमी लेयर लागू करने का कोई इरादा नहीं है। इस आश्वासन के बाद सहयोगियों पर अपना रुख नरम करने का दबाव था।
- वोट बैंक का संतुलन: चिराग पासवान केवल एक वर्ग के नेता बनकर नहीं रहना चाहते। उन्हें एनडीए के कोर वोटर (सामान्य और ओबीसी वर्ग) के हितों और भावनाओं का भी ध्यान रखना है, जो उप-वर्गीकरण के समर्थन में हो सकते हैं।
जीतन राम मांझी की ‘रहस्यमयी’ चुप्पी
इस पूरे घटनाक्रम में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के संरक्षक और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की चुप्पी सबसे ज्यादा हैरान करने वाली है।
- शुरुआत में मांझी ने भी चिराग की तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चिंता जताई थी।
- लेकिन पिछले कुछ दिनों से उन्होंने इस विषय पर पूरी तरह से मौन धारण कर लिया है।
- सियासी जानकारों का कहना है कि मांझी भांप चुके हैं कि केंद्र सरकार इस मुद्दे को शांति से सुलझाना चाहती है, इसलिए वे सरकार और अपनी सहयोगी भाजपा के साथ किसी भी टकराव से बच रहे हैं।
विपक्ष को मिला हमला करने का मौका
चिराग और मांझी के बदले हुए स्टैंड पर विपक्ष ने निशाना साधना शुरू कर दिया है। राजद (RJD) और कांग्रेस का आरोप है कि दलित राजनीति का दावा करने वाले ये नेता सत्ता की मलाई के सामने अपने सिद्धांतों से समझौता कर चुके हैं और ‘दिल्ली’ के निर्देश पर काम कर रहे हैं। आरक्षण और क्रीमी लेयर पर चिराग पासवान के बदले बोल और मांझी की चुप्पी साफ इशारा करती है कि गठबंधन की राजनीति में कई बार क्षेत्रीय अस्मिता और सिद्धांतों को सत्ता के संतुलन के आगे पीछे छोड़ना पड़ता है। अब देखना यह होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव के नजदीक आने पर चिराग अपने इस बदले रुख को अपने जमीनी वोटरों को कैसे समझा पाते हैं।



