मध्य-पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता की चर्चा तेज हो गई है। हालांकि युद्धविराम को लेकर बातचीत शुरू होने से पहले ही ईरान ने ऐसी शर्तें सामने रख दी हैं, जिन्हें मानना अमेरिका और इजरायल के लिए बेहद मुश्किल माना जा रहा है।

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कुछ समय पहले दावा किया था कि ईरान के साथ “अच्छी बातचीत” चल रही है। शुरुआत में तेहरान ने इन दावों का मजाक उड़ाया था, लेकिन बाद में उसने स्वीकार किया कि उसे कुछ मित्र देशों के जरिए अमेरिका की ओर से बातचीत का संदेश मिला है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान का साफ कहना है कि सिर्फ युद्ध रोकना ही काफी नहीं होगा, बल्कि उसकी सुरक्षा और आर्थिक हितों को भी सुनिश्चित करना होगा।

ईरान की प्रमुख मांगें क्या हैं?
- ईरान ने युद्धविराम के लिए अमेरिका के सामने कई अहम शर्तें रखी हैं। इनमें सबसे बड़ी मांग पश्चिम एशिया और फारस की खाड़ी क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हटाने की है। ईरान का मानना है कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी ही तनाव की एक बड़ी वजह है।
- ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण Strait of Hormuz पर नियंत्रण और वहां से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों से शुल्क वसूलने का अधिकार भी मांगा है। यह वही समुद्री मार्ग है जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार होता है।
- ईरान ने युद्ध के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के तौर पर आर्थिक मुआवजे की मांग भी उठाई है। हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई आंकड़ा सामने नहीं आया है, लेकिन रिपोर्ट्स में यह रकम सैकड़ों अरब डॉलर तक बताई जा रही है।
- इसके साथ ही तेहरान चाहता है कि उस पर लगाए गए सभी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंध खत्म किए जाएं और भविष्य में उसके खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई की गारंटी दी जाए।
- ईरान ने यह भी साफ किया है कि वह अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर किसी तरह की सीमा स्वीकार नहीं करेगा। इसके अलावा लेबनान में सक्रिय संगठन Hezbollah के खिलाफ इजरायली सैन्य कार्रवाई रोकने की मांग भी उसकी शर्तों में शामिल है।

अमेरिका और इजरायल के लिए ये शर्तें मुश्किल क्यों?
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की इन मांगों को मानना अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से भारी नुकसान का कारण बन सकता है। अगर अमेरिका पश्चिम एशिया से अपने सैन्य ठिकाने हटा लेता है तो इससे क्षेत्र में उसका प्रभाव कम हो सकता है और उसके सहयोगी देशों की सुरक्षा चिंताएं बढ़ सकती हैं।
वहीं होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान को शुल्क वसूलने का अधिकार देना वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर सकता है। इससे तेल की कीमतों पर ईरान का बड़ा नियंत्रण हो जाएगा, जिसे पश्चिमी देश शायद ही स्वीकार करें।
इजरायल लंबे समय से ईरान समर्थित संगठनों को अपने लिए खतरा मानता रहा है। ऐसे में हिज्बुल्लाह की सुरक्षा से जुड़ी शर्त पर सहमति बनना बेहद कठिन माना जा रहा है।
सबसे बड़ा मुद्दा ईरान के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को लेकर है। अमेरिका और इजरायल दोनों ही इस बात पर जोर देते रहे हैं कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ने से रोका जाए।

क्या शांति वार्ता संभव है?
मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि युद्ध खत्म करने के लिए बातचीत की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन दोनों पक्षों की कड़ी शर्तें किसी समझौते की राह को बेहद मुश्किल बना रही हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों की दिशा और तेज हो सकती है, लेकिन अंतिम सहमति तक पहुंचना आसान नहीं होगा।



