नई दिल्ली: श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद के बीच मौलाना जर्जिस अंसारी (Maulana Jarjis Ansari Controversial Statement) के एक बयान पर हंगामा मचा हुआ है। झारखंड में एक तकरीर के दौरान मौलाना ने दावा किया कि “भगवान श्रीकृष्ण पांचों वक्त की नमाज पढ़ते थे” (Controversial claim about Shri Krishna offering Namaz) और इसके समर्थन में उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के 10वें श्लोक का हवाला दिया। मौलाना यहीं नहीं रुके, उन्होंने हिन्दुओं की पूजा पद्धति पर भी सवाल उठाए और कहा कि इस्लाम सिर्फ मुस्लिमों का नहीं, ये हिन्दुओं का भी है।

हालांकि, उनके इस दावे के सामने आते ही संस्कृत और गीता के जानकारों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने सवाल उठाए कि जिस श्लोक का उल्लेख किया गया है, उसका नमाज या इस्लामी इबादत से कोई संबंध नहीं है (The Maulana gave an incorrect interpretation of a verse from the Gita)। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह धार्मिक ग्रंथ की गलत व्याख्या है या फिर विवादित बयान देकर चर्चा में आने की कोशिश?
गीता के श्लोक से नमाज का दावा, लेकिन अर्थ कुछ और
मौलाना ने जिस श्लोक का उल्लेख किया, वह है
योगी युञ्जित सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशिरपरिग्रहः॥
मौलाना ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को पूरे शरीर के साथ ईश्वर की उपासना करने की शिक्षा दे रहे हैं, जिसे उन्होंने नमाज से जोड़ने की कोशिश की (An attempt to link the worship of God with Namaz)।
लेकिन दिल्ली संस्कृत अकादमी द्वारा प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार इस श्लोक का अर्थ है कि साधक एकांत में रहकर, मन को नियंत्रित करके, इच्छाओं और संग्रह की भावना से मुक्त होकर ध्यान और योग का अभ्यास करे। इसमें कहीं भी नमाज, इस्लामी उपासना पद्धति या किसी विशेष धार्मिक रीति का उल्लेख नहीं है।
आगे-पीछे के श्लोक भी नहीं करते दावे की पुष्टि
सिर्फ 10वां श्लोक ही नहीं, उसके पहले और बाद के श्लोकों को भी पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि पूरा प्रसंग ध्यान योग, आत्मसंयम और साधना से जुड़ा है।
9वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण समभाव रखने वाले योगी की महिमा बताते हैं, जबकि आगे के श्लोकों में ध्यान की विधि और मन को नियंत्रित करने की शिक्षा दी गई है। धार्मिक विद्वानों का कहना है कि पूरे अध्याय का संदर्भ योग साधना है, न कि किसी विशेष पूजा-पद्धति का।
धार्मिक ग्रंथों की मनमानी व्याख्या क्यों?
जानकारों का मानना है कि किसी भी धर्मग्रंथ के एक श्लोक या एक पंक्ति को उसके मूल संदर्भ से अलग करके नई व्याख्या करना भ्रम पैदा कर सकता है। गीता के प्रत्येक अध्याय का अपना संदर्भ और दर्शन है। ऐसे में किसी श्लोक को आधुनिक धार्मिक परंपराओं से जोड़ना तब तक उचित नहीं माना जा सकता, जब तक उसका स्पष्ट आधार ग्रंथ में मौजूद न हो।
सोशल मीडिया पर बढ़ा विवाद
मौलाना के बयान का वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। बड़ी संख्या में लोगों ने सवाल उठाया कि क्या धार्मिक ग्रंथों की ऐसी व्याख्या समाज में अनावश्यक विवाद पैदा नहीं करती? कई लोगों ने यह भी कहा कि किसी भी धर्म के पवित्र ग्रंथ की व्याख्या करते समय उसके मूल अर्थ और संदर्भ का सम्मान किया जाना चाहिए। लोगों ने कहा कि ऐसे मौलाना सिर्फ सस्ती लोकप्रियता के लिए ऐसे विवादित बयान देते हैं (Attempting to grab headlines by making controversial statements)।
विवादित बोल से चर्चा में आने की कोशिश?
हाल के वर्षों में देखा गया है कि धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों पर दिए गए विवादित बयान कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो जाते हैं और राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाते हैं। ऐसे मामलों में अक्सर यह चर्चा भी होती है कि क्या उत्तेजक या असामान्य दावे सार्वजनिक ध्यान आकर्षित करने का माध्यम बन रहे हैं। तो क्या मौलाना जर्जिस अंसारी का ऐसा विवादित बयान देने के पीछे मंशा यहीं थी, कि बस चर्चा में आ जाएं?
मौलाना के बयान पर विवाद जारी
मौलाना जर्जिश अंसारी का बयान फिलहाल विवाद का विषय बना हुआ है, लेकिन जिस श्लोक के आधार पर उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के बारे में दावा किया, उसका प्रचलित और मान्य अर्थ उनके दावे का समर्थन नहीं करता। ऐसे में यह विवाद एक बार फिर इस बात की याद दिलाता है कि धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या मूल संदर्भ, प्रमाण और स्थापित अर्थों के आधार पर ही की जानी चाहिए, ताकि समाज में भ्रम और अनावश्यक विवाद से बचा जा सके।



