Wednesday, September 16, 2026
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NEET पर हंगामा, लाठीचार्ज पर राजनीति…मगर 13 यूथ कांग्रेसियों की मौत भूल गई कांग्रेस? सुवेन्दु अधिकारी ने सदन में रखी 33 साल पुरानी रिपोर्ट

देश की राजनीति में जब भी छात्रों पर कार्रवाई, पुलिस लाठीचार्ज या किसी प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा की बात होती है, कांग्रेस सबसे आगे खड़ी नजर आती है। NEET विवाद हो, छात्रों पर लाठीचार्ज का मामला हो या किसी प्रदर्शनकारी के साथ कथित ज्यादती। कांग्रेस पार्टी केंद्र सरकार को जमकर घेरती है, संसद से लेकर सड़क तक विरोध करती है और कई मामलों में इस्तीफे तक की मांग उठाती है। ऐसा ही नजारा इन दिनों दिख भी रहा है। सदन में लेकर सड़क तक कांग्रेस ने बवाल काटा हुआ है। मगर तल्ख तेवर अख्तियार की हुई कांग्रेस से ये पूछा जाए, कि क्या उसे 21 जुलाई 1993 का वो काला दिन याद है (21 July 1993 Firing)? 13 युवा कांग्रेसियों की मौत याद है? ये सवाल इसलिए क्योंकि 33 साल पुरानी उस रिपोर्ट को बंगाल में सीएम सुवेन्दु अधिकारी ने सदन में रखा तो कांग्रेस की जुबान खामोश रही (West Bengal Assembly)।

अपने कार्यकर्ताओं की मौत कांग्रेस को याद नहीं?

ऐसे में सवाल ये है कि क्या 21 जुलाई 1993 का वह दिन कांग्रेस भूल चुकी है, जब उसके ही 13 युवा कार्यकर्ता पुलिस की गोलियों का शिकार हुए थे? (Youth Congress Workers) क्या वे 13 लोग किसी के बेटे नहीं थे? क्या उनके परिवारों को न्याय मिलने का सवाल अब कांग्रेस के एजेंडे से बाहर हो चुका है? (Kolkata Firing Case)

CM सुवेन्दु ने सदन में रखी 33 साल पुरानी रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल विधानसभा में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने 1993 के गोलीकांड पर गठित न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुशांत चटर्जी आयोग की रिपोर्ट सदन में रखी (Sushanta Chatterjee Commission)। रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि पुलिस फायरिंग “अनावश्यक, अनुचित और बिना उकसावे” की थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि आयोग ने मृतकों के परिजनों को 25-25 लाख रुपये और घायलों को 5-5 लाख रुपये मुआवजा देने की सिफारिश की थी, लेकिन तत्कालीन सरकार ने इसे लागू नहीं किया। शुभेंदु अधिकारी ने ममता सरकार पर यह रिपोर्ट दबाकर रखने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी सरकार ने 2024 में रिपोर्ट मिलने के बावजूद न तो आयोग की कई अहम सिफारिशों को लागू किया और न ही रिपोर्ट को सार्वजनिक किया। सीएम सुवेन्दु अधिकारी ने घटना के पीड़ितों को मुआवजा देने और उनका केस नए सिरे से दर्ज करने का ऐलान किया।

33 साल पुराने केस पर CM की बड़ी घोषणा

शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की कि पीड़ित परिवार नई प्राथमिकी दर्ज करा सकते हैं। सीएम ने कहा कि उनकी सरकार मुख्यमंत्री राहत कोष से आयोग द्वारा अनुशंसित शेष मुआवजे की राशि का भुगतान करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि 21 जुलाई 1993 की घटना का राजनीतिक इस्तेमाल किया गया। कुछ लोगों ने इस घटना का इस्तेमाल करके राजनीतिक पद हासिल किए और सत्ता का आनंद लिया, वहीं पश्चिम बंगाल के लोगों को कभी यह नहीं बताया गया कि उस दिन असल में क्या हुआ था।

जानिए, 21 जुलाई 1993 को क्या हुआ था

21 जुलाई 1993 को ममता बनर्जी, जो उस समय कांग्रेस से जुड़ी थी। उन्होंने तत्कालीन राज्य सचिवालय, ‘राइटर्स बिल्डिंग’ तक एक विरोध मार्च निकाला था। उस समय राज्य में वाम मोर्चा की सरकार थी और ज्योति बसु मुख्यमंत्री थे, जबकि ममता बनर्जी प्रदेश युवा कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में शामिल थीं और प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही थीं। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि मतदाता पहचान पत्र के बिना मतदान की अनुमति न दी जाए। राइटर्स बिल्डिंग की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई, आरोप है कि इसके बाद पुलिस ने गोलीबारी की। इस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हुए। इस घटना ने राज्य की राजनीति पर गहरा असर डाला और ममता बनर्जी ने इसे लंबे समय तक राजनीतिक मुद्दा बनाए रखा। बाद के वर्षों में 21 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस ने ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाना शुरू किया (July 21 Martyrs Day)।

सबसे बड़ा सवाल, कांग्रेस की चुप्पी क्यों?

रिपोर्ट सदन में रखी गई। राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू हुई। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने आ गए। लेकिन जिस पार्टी के 13 कार्यकर्ता उस दिन मारे गए थे, उस कांग्रेस की ओर से इस रिपोर्ट पर कोई बड़ा आधिकारिक बयान सामने नहीं आया।

यहीं से सवाल उठता है

-क्या कांग्रेस के लिए अपने ही कार्यकर्ताओं की शहादत अब राजनीतिक महत्व नहीं रखती?
-क्या 13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौत पर पार्टी की जिम्मेदारी खत्म हो गई?
-क्या यह मुद्दा इसलिए असहज है क्योंकि बाद में ममता बनर्जी कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बना चुकी थीं?
-जब दूसरे मुद्दों पर कांग्रेस सबसे मुखर होती है…

कांग्रेस अक्सर कहती है कि लोकतंत्र में आवाज़ उठाना उसका कर्तव्य है। छात्रों पर कार्रवाई हो, किसी प्रदर्शन पर पुलिस बल का इस्तेमाल हो या किसी नागरिक की मौत। पार्टी सरकारों से जवाब मांगती है। ऐसे में विपक्ष सवाल उठा रहा है कि अगर आज किसी घटना में 13 प्रदर्शनकारियों की मौत हो जाए, तो क्या कांग्रेस चुप बैठती? शायद नहीं। फिर 21 जुलाई 1993 के मामले में वही आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई दे रही?

13 परिवारों को क्या मिला?

सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि आयोग की सिफारिशों के अनुरूप मुआवजा तक नहीं दिया गया। उनका दावा है कि मृतकों के परिवारों को केवल 2 लाख रुपये और घायलों को 15 हजार रुपये दिए गए। उन्होंने यह भी घोषणा की कि उनकी सरकार शेष मुआवजा देने और जरूरत पड़ने पर पीड़ित परिवारों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराएगी। यदि यह मामला वास्तव में न्याय से जुड़ा है, तो फिर सवाल केवल तृणमूल या वामपंथ तक सीमित नहीं है। सवाल कांग्रेस से भी है, क्योंकि जिन लोगों की मौत हुई, वे उसी पार्टी के युवा कार्यकर्ता थे।

राजनीति बनाम संवेदना

21 जुलाई को हर साल पश्चिम बंगाल में शहीद दिवस मनाया जाता है। मंच सजते हैं, रैलियां होती हैं और राजनीतिक संदेश दिए जाते हैं। लेकिन तीन दशक बाद भी यह सवाल कायम है कि क्या उन 13 परिवारों को न्याय मिला? और यदि नहीं मिला, तो क्या कांग्रेस ने कभी पूरे दम से उनकी लड़ाई लड़ी? विधानसभा में रिपोर्ट रखे जाने के बाद अब निगाहें कांग्रेस पर हैं। क्या पार्टी इस रिपोर्ट पर अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया देगी? क्या वह अपने 13 दिवंगत कार्यकर्ताओं के लिए न्याय की मांग उठाएगी? या फिर यह मामला राजनीतिक इतिहास के पन्नों तक ही सीमित रह जाएगा?

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