तमिलनाडु सरकार मिड-डे मील योजना में हफ्ते में एक दिन चिकन बिरयानी शामिल करने पर विचार कर रही है (Tamil Nadu Mid Day Meal Scheme)। यानि कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को हफ्ते में एक दिन चिकन बिरयानी मिलेगी (Chicken Biryani in Mid Day Meal)। सरकार का तर्क है कि इससे बच्चों को बेहतर प्रोटीन मिलेगा और भोजन अधिक आकर्षक बनेगा। अगर भोजन लजीज और आकर्षक होगा तो सरकारी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। मगर सवाल ये कि क्या आकर्षण सिर्फ चिकन में ही है? क्या चिकन के अलावा कुछ लजीज नहीं होता? रहा सवाल प्रोटीन का, तो क्या चिकन ही एकमात्र प्रोटीन का सोर्स है? क्योंकि सवाल सिर्फ पोषण का नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक संतुलन का भी है।
सभी बच्चों के लिए एक जैसा मेन्यू उचित होगा?
तमिलनाडु में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जो धार्मिक, सांस्कृतिक या व्यक्तिगत कारणों से मांसाहार नहीं करते। ऐसे में अगर सरकारी स्कूल के खाने में हफ्ते में एक दिन चिकन परोसा जाता है, तो उन बच्चों का क्या जो शाकाहारी हैं? क्या वो उस दिन खाना नहीं खाएंगे? या स्कूल में जो बना है उन्हें वही खाने को मजबूर होना पड़ेगा? अगर इन सवालों पर सरकार ने गौर नहीं किया, तो फिर योजना के मूल उद्देश्य पर ही सवाल खड़े होते हैं (Non Veg Mid Day Meal)।
क्या प्रोटीन का मतलब सिर्फ चिकन है?
पोषण विशेषज्ञ लंबे समय से बताते रहे हैं कि प्रोटीन केवल चिकन से ही नहीं मिलता। दालें, राजमा, छोले, सोयाबीन, पनीर, दूध, दही, मूंगफली भी अच्छे प्रोटीन स्रोत हैं। ऐसे में सवाल इसलिए भी कि चिकन को ही लजीज, आकर्षक और प्रोटीन का सोर्स क्यों माना जा रहा है? सरकार ने शाकाहार वाले विकल्पों को प्राथमिकता क्यों नहीं दी? क्या कम विवादित और सभी के लिए स्वीकार्य विकल्पों पर विचार सबसे फायदेमंद नहीं होता? सरकार यदि वास्तव में बच्चों के हित में फैसला लेना चाहती है तो उसे केवल यह नहीं बताना चाहिए कि चिकन क्यों जरूरी है, बल्कि यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि मांसाहारी भोजन न करने वाले लाखों बच्चों के अधिकार और उनकी भावनाओं की रक्षा कैसे की जाएगी? (Vegetarian Students)
उन बच्चों का क्या, जो मांसाहार नहीं करते?
सरकारी योजनाएं केवल पोषण का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे करोड़ों परिवारों की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता से भी जुड़ी होती हैं। इसलिए किसी भी राज्य सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसा मॉडल अपनाए जिसमें किसी भी वर्ग को यह महसूस न हो कि उसकी जीवनशैली या धार्मिक मान्यताओं की अनदेखी की गई है। 2011 की जनगणना के अनुसार तमिलनाडु में हिंदू जनसंख्या 6,31,88,168 है, जो राज्य की कुल आबादी का 87.58% है। जबकि ईसाई 6.12% और मुस्लिम आबादी 5.86% है। राज्य के सभी जिलों में हिंदू बहुसंख्यक हैं यानि कि हिन्दुओं की आबादी ज्यादा है। ऐसे में सवाल ये कि आखिर मिड-डे मील योजना किसके लिए है? केवल उन बच्चों के लिए जो चिकन खाते हैं या उन सभी बच्चों के लिए जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं? (Mid Day Meal Controversy)
बीफ पर भी बैन हटवा चुकी है सरकार
हाल के वर्षों में तमिलनाडु में गोवंश वध से जुड़े कानूनी विवाद भी चर्चा में रहे हैं। कुछ दिन पहले ही तमिलनाडु में हाईकोर्ट में बीफ पर लगा बैन भी सुप्रीम कोर्ट जाकर हटवाया गया है। Tvk सरकार इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गई। कांग्रेस नेता व अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने सरकार की तरफ से केस लड़ा, जिसके बाद तमिलनाडु में बीफ पर लगा बैन हटा। सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई 2026 को मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें तमिलनाडु में गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था। यह राहत राज्य सरकार की अपील पर दी गई है। ऐसे माहौल में यदि सरकार मिड-डे मील जैसे संवेदनशील विषय में मांसाहारी भोजन जोड़ने पर विचार करती है, तो स्वाभाविक है कि राजनीतिक बहस तेज होगी।
क्या यह फैसला राजनीतिक बहस का विषय बनेगा?
विपक्षी दल इस फैसले को अलग-अलग नजरिए से देख सकते हैं। कुछ इसे बच्चों के पोषण के लिए सकारात्मक कदम बताएंगे, जबकि कुछ इसे सांस्कृतिक संवेदनशीलता की अनदेखी या राजनीतिक संदेश के रूप में पेश कर सकते हैं। क्योंकि जिन भी राज्यों में कांग्रेस है, वहां तुष्टिकरण की नीति के आरोप लगते रहे हैं। ये आरोप लगते रहे हैं कि ऐसी नीतियां सिर्फ एक वर्ग विशेष को खुश करने के लिए लाई जाती है। कुल मिलाकर मिड-डे मील का उद्देश्य बच्चों को बेहतर पोषण देना है, न कि किसी सामाजिक या राजनीतिक विवाद को जन्म देना। यदि सरकार संतुलित नीति अपनाती है और हर बच्चे की आस्था, पसंद और पोषण संबंधी जरूरतों का समान सम्मान करती है, तो योजना सफल हो सकती है। लेकिन अगर सरकार का फैसला एकतरफा रहा, तो फिर नीति और नीयत दोनों पर पर सवाल उठते रहेंगे।



