Wednesday, April 17, 2024
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नोटबंदी को सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर ठहराया सही, जानिए एक जस्टिस की अलग राय क्यों?

8 नवंबर 2016..ये वो तारीख थी, जब केन्द्र सरकार ने अचानक नोटबंदी कर पूरे देश को चौंका दिया था। 500 और 1000 के नोट अचानक चलन से बाहर हो गए थे। सरकार के इस फैसले के खिलाफ 58 याचिकाएं दाखिल की गई थीं, जिन्हें खारिज कर सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी को सही ठहराया है। जस्टिस अब्दुल नज़ीर की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से माना है कि फैसला लेने की प्रकिया में कोई क़ानूनी खामी नहीं है। जस्टिस बी आर गवई ने अपना, जस्टिस अब्दुल नज़ीर, जस्टिस एएस बोपन्ना ,जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन का फैसला पढ़ा। जस्टिस गवई ने बहुमत का फैसला पढ़ते हुए कहा कि आर्थिक नीति के मामलों में कोर्ट बेहद सीमित ही दखल दे सकता है। कोर्ट, एक्सपर्ट की राय की जगह नहीं ले सकता। जो रिकॉर्ड कोर्ट में पेश किया गया है, उसके मुताबिक फैसला लेने की प्रकिया में कोई खामी नहीं थी।

6 महीने से चल रहा था RBI और सरकार में विमर्श

जस्टिस गवई ने चार जजों के फैसला पढ़ते हुए कहा कि आठ नवंबर 2016 को ये फैसला लेने से करीब 6 महीने पहले ही सरकार और RBI के बीच इसको लेकर विचार विमर्श चल रहा था।यानि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को खारिज कर दिया कि नोटबंदी का फैसला बिना इसके परिणामों पर विचार किए बगैर एकाएक लिया गया। जस्टिस गवई ने कहा कि नोटबंदी का मकसद ब्लैक मनी, आतंकी फंडिंग पर रोक लगाना था। नोटबंदी के ये निर्धारित लक्ष्य हासिल हुए हैं या नहीं, ये अब अप्रासंगिक है।

एक्ट के मुताबिक सारे नोट वापस लेने का अधिकार

जस्टिस गवई ने ये भी कहा कि RBI एक्ट 1934 के सेक्शन 26 (2) के तहत सरकार को सिर्फ कुछ विशेष नोट की सीरीज ही नहीं, बल्कि सारी सीरीज के नोटो का वापस लेने का अधिकार है। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि इस एक्ट के तहत सिर्फ कुछ ख़ास सीरीज के नोट को ही वापस लिया जा सकता है, सभी नोटों को नहीं।

नोट बदलने के लिए पर्याप्त वक़्त दिया गया

संविधान पीठ ने बहुमत से याचिकाकर्ताओं की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि 500 और 1000 के पुराने नोटों को नए से बदलने के लिए पर्याप्त वक़्त नहीं दिया गया। जस्टिस गवई ने कहा कि 1978 में सिर्फ तीन का वक़्त दिया गया था, जबकि 2016 में 52 दिन दिए गए। आरबीआई के पास इस समयसीमा को बढ़ाने का कोई स्वतंत्रत अधिकार नहीं है।

जस्टिस नागरत्ना

जस्टिस नागरत्ना ने फैसले की प्रकिया को ग़लत ठहराया

हालांकि बेंच की एक अन्य सदस्य जस्टिस नागरत्ना बहुमत की राय से सहमत नहीं थी। उन्होंने अपना अलग फैसला पढ़ते हुए नोटबन्दी के फैसला लेने की प्रकिया को ग़लत ठहराया। उन्होंने कहा कि

भले ही आर्थिक नीति के मामलों में कोर्ट के दखल की गुजाइश कम हो, पर कोर्ट इसकी समीक्षा कर सकता है कि क्या फैसला लेने की प्रकिया ठीक थी या नहीं।इस तरह के फैसले की पहल सरकार के बजाए RBI की तरफ से होनी चाहिए थी। सरकार अगर ऐसा फैसला लेती है तो बिना संसद को विश्वास में लिए ऐसा नहीं किया जा सकता। ऐसा फैसला जिसका सामाजिक -आर्थिक तौर पर गहरा असल पड़ने वाला था, उनमें संसद की राय अहमियत रखती है।

RBI ने अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया- जस्टिस नागरत्ना

केन्द्र सरकार की ओर से भेजे गए प्रस्ताव को RBI ने यूँ ही मंजूरी दे दी, अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया। 7 नवंबर से 8 नवंबर के बीच महज 24 घंटे के अंदर ये फैसला ले लिया गया। महज एक गजट नोटिफिकेशन के जरिये ऐसा फैसला लागू करना गैरकानूनी है।

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