Saturday, April 18, 2026
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Iran-Israel War: अमेरिका की ‘तेल वाली छूट’ पर सियासी तनातनी, कांग्रेस ने सरकार को बताया अमेरिकी कठपुतली

US oil concessions from Russia: ईरान-इजरायल जंग की वजह से क्या भारत में OIL CRISIS होगा? क्या स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज बंद होने से भारत में कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होगी? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस मुद्दे पर पहली बार सार्वजनिक बयान दिया। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि,”इस जंग का असर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर पड़ रहा है, ये क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम है, इस क्षेत्र में कोई रुकावट आती है तो इसका सीधा असर तेल, गैस की आपूर्ति पर पड़ता है”। राजनाथ सिंह के इस बयान से ठीक पहले अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि, “अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की सप्लाई को बनाए रखने के लिए भारतीय रिफाइनरियों को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिन की छूट दी गई है।

” ट्रंप प्रशासन के इस बयान और राजनाथ सिंह की चिंता ने कांग्रेस को सियासी मुद्दा दे दिया।कांग्रेस ने ये कहते हुए सरकार पर हमला कर दिया कि, देश के हितों से समझौता किया गया है। सरकार अमेरिका के हाथों की कठपुतली बन गई है। कांग्रेस के संचार प्रभारी महासचिव जयराम रमेश ने X पर एक पोस्ट में कहा कि, “ट्रंप का नया खेल, दिल्ली दोस्त को कहा, पुतिन से ले सकते हो तेल, कब तक चलेगा, यह अमेरिकी ब्लैकमेल।”

कांग्रेस के आरोपों पर क्या बोली सरकार?

कांग्रेस ने ट्रंप प्रशासन के उस बयान को आधार बनाया जिसमें कहा गया था कि, भारत ने रूसी तेल खरीद कम करने का आश्वासन दिया था इसलिए ट्रेड डील के तहत टैरिफ घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया है, जो पहले 50 फीसदी था। लेकिन, सवाल ये है कि, क्या ट्रंप प्रशासन तब भी सही कह रहा था, और क्या अब भी सही कह रहा है? भारत के विदेश मंत्रालय ने ट्रेड डील के बाद भी ये कहा था कि, भारत अपने हितों को देखते हुए ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए स्वतंत्र है। यही नहीं शुक्रवार को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि, “आज कोई भी देश सर्वोपरि वर्चस्व वाला देश नहीं है।” कूटनीति में हर बार चीज़ें साफ-साफ नहीं बोली जाती, इशारों में संदेश दिया जाता है। भारत ने भी संदेश दे दिया है कि, उसके अपने हित हैं, अपनी मित्रता है, अपने संबंध हैं, और उन सबको हाशिए पर रखकर वो एक देश की हां में हां नहीं मिलाने वाला।

भारत के पास कितना रिजर्व ऑयल?

पिछले कुछ दिनों के आंकड़े भी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि, अमेरिकी दावों और दलीलों के बावजूद भारत और रूस के व्यापारिक संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ा है। फरवरी 2026 तक रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है, कुल आयात का लगभग 35 से 38 प्रतिशत हिस्सा रूस से आता है, पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों के जरिए ये आपूर्ति जारी रखी है, वर्ष 2025 के दौरान भारत रोज करीब 1.40 मिलियन बैरल रूसी तेल खरीद रहा था। अब सवाल ये उठता है कि, रूस से क्रूड ऑयल इंपोर्ट करने के बावजूद भी क्या OIL CRISIS हो सकता है? फरवरी 2026 में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने संसद में कहा था कि Strategic Petroleum Reserve और कमर्शियल स्टॉक को मिलाकर भारत के पास करीब 74 दिनों की तेल जरूरतों को पूरा करने की क्षमता है। वहीं एनालिसिस फर्म केप्लर के अनुमान के मुताबिक भारत के पास लगभग 100 मिलियन बैरल कमर्शियल क्रूड स्टॉक मौजूद है, जो देश की रोजाना लगभग 5 मिलियन बैरल खपत के हिसाब से 40 से 45 दिनों तक चल सकता है। दोनों आंकड़ों का औसत भी निकाल लें तो भारत के पास इतना ऑयल रिजर्व है कि, करीब 50 दिनों तक उसे कोई दिक्कत नहीं होगी।

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