जब जेहन में जहर हो और मंसूबे में फरेब…तो शांतिदूत वाला नकाब ज्यादा दिन चल नहीं पाता। अमेरिका-इजराइल और ईरान के युद्ध को रोकने की मध्यस्थता का दावा करने वाले पाकिस्तान का मुखौटा ऐसा गिरा, कि पूरी दुनिया के आगे EXPOSE हो गया। समझौते को लेकर ‘इस्लामाबाद वार्ता’ से ठीक पहले, जब पाकिस्तान खुद को अमेरिका-ईरान के बीच एक “शांतिदूत” के रूप में पेश कर रहा था, तभी उसके ही रक्षा मंत्री ने जहर उगलकर मंसूबे बेनकाब कर दिए।

कहानी की शुरुआत होती है पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक विवादित पोस्ट से। ख्वाजा आसिफ ने इजरायल को “मानवता के लिए अभिशाप” करार दिया (Pakistan Israel controversy)। उन्होंने लिखा कि
“इजरायल मानवता के लिए अभिषाप है, इस्लामाबाद में शांति वार्ता चल रही है, वहीं लेबनान में नरसंहार हो रहा है। इजरायल निर्दोषों को मार रहा है। पहले गाजा, फिर ईरान और अब लेबनान में। मेरी दुआ है जिन लोगों ने इसे बनाया वे नरक में जलें”: ख्वाजा आसिफ, रक्षा मंत्री ,पाकिस्तान

ये बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं था, ये सीधा-सीधा एक ऐसे देश पर हमला था, जो वैश्विक राजनीति में बेहद प्रभावशाली माना जाता है। जैसे ही यह पोस्ट सामने आया, बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय से तुरंत और तीखी प्रतिक्रिया आई (Netanyahu reaction Pakistan)। बयान को अपमानजनक बताते हुए साफ संदेश दिया गया कि (Israel objection Pakistan)…
“ऐसी भाषा बर्दाश्त नहीं की जाएगी”। यह बयान इजरायल को खत्म करने की मांग जैसा है। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, खासकर उस देश से जो खुद को शांति वार्ता का मध्यस्थ बता रहा हो।
और फिर जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया। कुछ ही देर में ख्वाजा आसिफ का वो पोस्ट गायब हो गया। बिना किसी सफाई के, बिना किसी बहाने के..सीधे डिलीट (Khawaja Asif tweet deleted)। अब सवाल उठने लगे क्या ये सिर्फ एक पोस्ट हटाना था, या फिर अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे पाकिस्तान का झुकना? (Pakistan diplomatic pressure) राजनीतिक गलियारों में इसे “कूटनीतिक सरेंडर” कहा जा रहा है (Pakistan foreign policy crisis)। विशेषज्ञ मानते हैं कि जिस वक्त पाकिस्तान को अपनी न्यूट्रल छवि मजबूत करनी थी, उसी वक्त उसका एक मंत्री आग उगलने लगा और फिर उसी तेजी से पीछे हटना पड़ा।
‘इस्लामाबाद वार्ता‘ पर भरोसा करेगा इजरायल?
यह विवाद ऐसे समय में हुआ है जब पाकिस्तान ‘इस्लामाबाद वार्ता’ (Islamabad talks news) के जरिए खुद को एक बड़े शांतिदूत के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस एक घटना ने उसकी छवि पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। कूटनीतिक जानकारों का साफ कहना है “अगर आप शांति की मेज पर बैठना चाहते हैं, तो बयानबाजी में संतुलन रखना जरूरी है… वरना भरोसा टूटने में देर नहीं लगती।” पाकिस्तान के इस रवैये के बाद पाकिस्तान में युद्ध को लेकर होने वाली ‘इस्लामाबाद वार्ता’ सवालों के घेरे में है।



