मिडिल ईस्ट में जंग खत्म हो गई है। इरान और अमेरिका के बीच शांति समझौता हो गया है (US Iran Peace Deal), जिसका असर अब वैश्विक तेल बाजार में साफ दिखाई देने लगा है। 2 महीने तक बाधित रहने के बाद ईरान ने एक बार फिर होर्मुज के रास्ते कच्चे तेल का निर्यात शुरू कर दिया है (Iran Oil Exports)। यह सिर्फ ईरान या अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए राहत भरी खबर मानी जा रही है। टैंकर ट्रैकिंग से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, नेशनल ईरानी टैंकर कंपनी (NITC) के कई बड़े तेल टैंकर (Iranian Oil Tankers) अमेरिकी नाकाबंदी क्षेत्र को पार कर अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर पहुंच चुके हैं। इनमें लाखों बैरल ईरानी कच्चा तेल भरा हुआ है, जो वैश्विक बाजार में सप्लाई बढ़ाने का संकेत देता है (Global Oil Market)।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज जलडमरूमध्य?
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है (Oil Supply Route Hormuz Strait)। जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा, तब इसी मार्ग पर सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया था। इससे दुनिया भर में तेल आपूर्ति प्रभावित होने और कीमतों में तेज उछाल की आ गई थी। अब शांति समझौते के बाद जहाजों की आवाजाही सामान्य होने लगी है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौटने की उम्मीद बढ़ गई है।
भारत को क्या होगा फायदा?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट का सीधा फायदा भारत को मिल सकता है। जब कच्चा तेल सस्ता होता है (Crude Oil Prices) तो तेल कंपनियों की लागत घटती है। यदि कीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहती हैं, तो भविष्य में पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर रहने या कम होने की संभावना बढ़ जाती है।
महंगाई पर लग सकता है ब्रेक
भारत में परिवहन लागत का असर लगभग हर वस्तु और सेवा पर पड़ता है। ईंधन सस्ता होने से ट्रांसपोर्टेशन खर्च घट सकता है, जिससे खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं और अन्य जरूरी सामानों की कीमतों पर दबाव कम होगा।
सरकार का आयात बिल घटेगा
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारत का तेल आयात बिल कम होगा। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। इससे रुपये को भी बल मिल सकता है। क्योंकि कम आयात बिल का मतलब डॉलर की मांग में कमी। इससे भारतीय रुपये पर दबाव घट सकता है और मुद्रा बाजार में स्थिरता आ सकती है।
बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को राहत की उम्मीद
तेल बाजार लंबे समय से इस बात को लेकर चिंतित था कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक प्रभावित रहा तो वैश्विक सप्लाई चेन संकट में आ सकती है। लेकिन अब ईरानी तेल की वापसी से बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति आएगी। इसी वजह से ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगातार नीचे आ रही हैं। जो तेल कुछ समय पहले 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचने की आशंका पैदा कर रहा था, वह अब 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे फिसल चुका है। इससे अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान और भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को राहत मिलने की उम्मीद है।
क्या भारत फिर खरीदेगा ईरानी तेल?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं और प्रतिबंधों से जुड़े मुद्दों में और नरमी आती है, तो भारत भविष्य में ईरान से तेल खरीद बढ़ाने पर विचार कर सकता है। ईरान पहले भी भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है और वहां का कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त माना जाता है (Iran Oil Trade)।
दुनिया की नजर, अब आगे क्या होगा?
फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर है कि अमेरिका-ईरान समझौता कितना टिकाऊ साबित होता है। यदि शांति बनी रहती है और होर्मुज के रास्ते तेल की सप्लाई लगातार बढ़ती है, तो आने वाले महीनों में वैश्विक तेल बाजार और अधिक स्थिर हो सकता है। इसका सबसे बड़ा लाभ उन देशों को मिलेगा जो तेल आयात पर निर्भर हैं, और भारत उनमें सबसे प्रमुख देशों में शामिल है।



