नई दिल्ली: डिजिटल पेमेंट के दौर में भी बड़े लेन-देन जैसे प्रॉपर्टी डील, बिजनेस ट्रांजैक्शन और उधारी के भुगतान में चेक का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है। लेकिन लोगों को अक्सर उस समय भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है जब सामने वाला व्यक्ति चेक तो दे देता है, लेकिन खाते में पैसा न होने या जानबूझकर भुगतान रोकने की वजह से चेक बाउंस हो जाता है। ऐसे मामलों में अब आम आदमी के लिए बड़ी राहत की खबर है। अदालतों और सरकार ने चेक बाउंस मामलों को लेकर प्रक्रियाओं को और अधिक प्रभावी बनाया है (Cheque Bounce Law) ताकि पीड़ित व्यक्ति को वर्षों तक न्याय का इंतजार न करना पड़े।
आम आदमी को क्या फायदा मिलेगा?
पहले चेक बाउंस (Cheque Bounce Case) होने के बाद लोगों को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती थी। कई बार आरोपी अदालत की प्रक्रिया का फायदा उठाकर मामला वर्षों तक लटकाता रहता था। लेकिन अब अदालतें ऐसे मामलों का तेजी से निपटारा करने पर जोर दे रही हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को होगा जो किसी को उधार देते हैं, दुकान या व्यापार करते हैं, किराए पर मकान देते हैं या किसी तरह के वित्तीय लेन-देन में चेक स्वीकार करते हैं।
चेक बाउंस हुआ तो कानून आपके साथ
यदि किसी व्यक्ति ने आपको चेक दिया और वह बैंक में जमा करने पर बाउंस हो गया, तो अब आपके पास मजबूत कानूनी अधिकार हैं (Cheque Bounce Case)। बैंक से “चेक रिटर्न मेमो” (Cheque Return Memo) मिलने के बाद आप 30 दिनों के भीतर कानूनी नोटिस भेज सकते हैं। यदि नोटिस मिलने के 15 दिनों के अंदर भुगतान नहीं किया जाता, तो अदालत में मुकदमा दायर किया जा सकता है। इस प्रक्रिया से ईमानदार लोगों को अपने पैसे की वसूली का कानूनी रास्ता मिलता है।
दोषी को जेल और भारी जुर्माना
Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत दोषी पाए जाने पर आरोपी को दो साल तक की जेल, चेक राशि के दोगुने तक जुर्माना या दोनों सजा हो सकती हैं। यानी अब चेक देकर भुगतान से बचना आसान नहीं होगा (Legal Action on Cheque Bounce)।
चेक बाउंस के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने (Supreme Court Guidelines) धारा 138 NI Act के नियमों के अनुसार क्षेत्राधिकार का विवाद खत्म करने और मुकदमों का निपटारा तेजी से होने की दिशा में साफ किया है कि अब केस उसी अदालत में दायर होगा जिसके अधिकार क्षेत्र में शिकायतकर्ता का बैंक खाता स्थित है।
अब अपील करने पर भी जमा करनी होगी रकम
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार यदि आरोपी निचली अदालत के फैसले को चुनौती देता है, तो उसे चेक राशि या जुर्माने का कम से कम 20 प्रतिशत हिस्सा अदालत में जमा करना होगा। इससे झूठी और समय बर्बाद करने वाली अपीलों पर रोक लगेगी और पीड़ित पक्ष को राहत मिलेगी (Money Recovery)।
‘पेमेंट रोक दो’ कहकर भी नहीं बच पाएंगे
कई लोग बैंक को भुगतान रोकने का निर्देश देकर कानूनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि यदि यह कदम धोखाधड़ी के इरादे से उठाया गया है, तो यह भी अपराध माना जाएगा। यानी खाते में पैसा होने के बावजूद जानबूझकर भुगतान रुकवाना भी जेल तक पहुंचा सकता है।
धोखाधड़ी साबित हुई तो 7 साल तक की जेल
1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत यदि जांच में धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा या जालसाजी का तत्व सामने आता है, तो आरोपी पर अतिरिक्त धाराएं लग सकती हैं।ऐसे मामलों में दोषी को 7 साल तक की जेल और जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।
छोटे व्यापारियों और मकान मालिकों के लिए बड़ी राहत
विशेषज्ञों का मानना है कि इन सख्त प्रावधानों का सबसे ज्यादा फायदा छोटे व्यापारियों, दुकानदारों, मकान मालिकों, ठेकेदारों और मध्यम वर्गीय लोगों को मिलेगा। अब चेक देकर भुगतान टालने या धोखा देने वालों पर कानूनी शिकंजा और मजबूत होगा। चेक बाउंस को अब केवल बैंकिंग समस्या नहीं बल्कि गंभीर कानूनी अपराध माना जा रहा है। अदालतों की सख्ती, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और नए कानूनी प्रावधान यह संदेश दे रहे हैं कि किसी का पैसा दबाने या चेक के जरिए धोखा देने वालों के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी। वहीं आम आदमी को अपने अधिकारों की रक्षा और समय पर न्याय मिलने की उम्मीद पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है।



