महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल देखने को मिल रहा है। शिवसेना (यूबीटी) (Shiv Sena UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती सत्ता पक्ष या विपक्ष की नहीं,बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर उठी बगावत है। पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे खेमे में जाने की चर्चाओं ने (Eknath Shinde Group) उद्धव ठाकरे की राजनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया है (Shiv Sena Rebellion)।
बगावत के बीच उद्धव ठाकरे का प्लान
खबर है कि इस संकट के बीच उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसे राजनीतिक जानकार उनकी सबसे बड़ी जवाबी रणनीति मान रहे हैं (Uddhav Master Plan)। उद्धव अब सीधे बागी सांसदों (Rebel MPs) के लोकसभा क्षेत्रों में जाकर (Lok Sabha Constituencies) जनता और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी बात रखेंगे (Uddhav Thackeray Tour)। उनका मकसद सिर्फ संगठन को बचाना नहीं, बल्कि उन नेताओं को जनता की अदालत में कटघरे में खड़ा करना भी है, जिन्हें वे पार्टी के साथ “धोखा” करने वाला मान रहे हैं।
26 जून से शुरू होगा उद्धव ठाकरे का दौरा
26 जून से शुरू होने वाले इस दौरे में उद्धव ठाकरे यवतमाल-वाशिम, हिंगोली, परभणी, धाराशिव और शिर्डी समेत 6 लोकसभा क्षेत्रों का दौरा करेंगे। इन क्षेत्रों में वे कार्यकर्ताओं से संवाद करेंगे और यह बताने की कोशिश करेंगे कि जिन नेताओं को जनता ने शिवसेना और बालासाहेब ठाकरे के नाम पर चुना, वही अब पार्टी छोड़ने की राह पर हैं, यानि कि धोखे की राह पर हैं।
उद्धव ठाकरे की शिवसैनिकों से भावुक अपील
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान उद्धव ठाकरे का भावनात्मक पक्ष भी सामने आया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि वे राजनीति में किसी पद से चिपके रहने नहीं आए हैं। अगर सच्चे शिवसैनिकों को लगे कि उन्हें नेतृत्व नहीं करना चाहिए, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने को तैयार हैं।
टूट और बिखराव से गुजरती शिवसेना
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उद्धव ठाकरे का यह बयान उनकी बेचैनी और पार्टी को टूटने से बचाने की चिंता को दर्शाता है (Shiv Sena Crisis)। कभी महाराष्ट्र की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली शिवसेना आज लगातार टूट और बिखराव के दौर से गुजर रही है। पहले एकनाथ शिंदे की बगावत और अब सांसदों के संभावित विद्रोह ने उद्धव ठाकरे को रक्षात्मक मोर्चे पर ला खड़ा किया है (Shiv Sena Split)।
पार्टी और विरासत बचा पाएंगे उद्धव ठाकरे?
ऐसे में बागी सांसदों के क्षेत्रों में जाकर जनता के बीच लड़ाई लड़ने का फैसला यह संकेत देता है कि उद्धव ठाकरे अब संगठन को बचाने के लिए सीधे जमीनी राजनीति का रास्ता अपनाने जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या जनता के बीच जाकर वे बागियों के खिलाफ माहौल बना पाएंगे, या फिर यह संघर्ष शिवसेना (यूबीटी) के लिए और मुश्किलें खड़ी करेगा? फिलहाल इतना तय है कि उद्धव ठाकरे के लिए यह सिर्फ राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि अपनी विरासत और पार्टी के अस्तित्व को बचाने की जंग बन चुकी है।



